सजा मिलने के बावजूद भी आरोपी करता रहा ठगी का कारोबार

मुंबई – किसी मामले में अगर कोई एफआईआर दर्ज होती है, तो पुलिस वेरिफिकेशन जरूर करते है। आरईसी के खिलाफ अगर एफआईआर दर्ज होती है, तो पुलिस वेरिफिकेशन की जरूरी प्रकिया की वजह से उसका पासपोर्ट बनना या उसका नवीनीकरण मुश्किल होता है। करोड़पति ठग मनोज कुमार कोर्ट द्वारा 16 साल की सजा मिलने के बावजूद अपना ठगी का कारोबार बढ़ाने के लिए नियमित विदेश जाता रहा और जांच एजेंसियों को उसकी सजा की जानकारी तक नहीं थी।
मनोज को मुंबई क्राइम ब्रांच के प्रॉपर्टी सेल ने कुछ दिनों पहले गिरफ्तार किया। वह उस रैकेट का हिस्सा है, जिसने अमेरिकियों के डेबिट और कार्ड की डिटेल निकालकर भारत में 40 करोड़ रुपये से ज्यादा की ठगी की।
सीनियर इंस्पेक्टर सुनील बजारे और इंस्पेक्टर लक्ष्मीकांत सालुंखे की जांच में पता चला कि, मनोज मूल रूप से चैन्ने का निवासी है लेकिन, वह बेंगलुरु में शिफ्ट हो गया था । उसका मूल कारोबार मसाले का बिजनस है, बाद में उसने साइड बिजनस भी शुरू किया । डेटा चोरी को उसने अपना मुख्य धंधा बना लिया और इस वास्ते वह विदेश भी नियमित जाता रहा। उसकी मलेशिया के किसी नागरिक से जान पहचान थी। वह मलेशियाई विदेशियों का डेटा हैक करता था और फिर उसे मनोज कुमार को देता था। मनोज कुमार फिर भारत में अपने गैंग के लोगों को इसे शेयर करता था।
क्राइम ब्रांच के एक अधिकारी के अनुसार, विदेशों में सबसे सस्ता डेटा अमेरिकियों का बिकता है और सबसे महंगा चीन का। मनोज कुमार अपने मलेशियाई दोस्त से प्रति अमेरिकी डेटा 15 डॉलर में लेता था। डेटा मिलने के बाद वह उसे अपने गैंग के लोगों को शेयर करता था। क्राइम ब्रांच के अधिकारी का कहना है कि, यह एक तरह का जुआ था, जिसमें किसी डेटा से कार्ड क्लोन कर 50 हजार रुपये भी कमाए जा सकते थे और पांच लाख भी।
मनोज कुमार ने अपने ठग मलेशियाई दोस्त का नाम नहीं बताया है। बस, इतना ही बताया कि वह उसे चेहरे से पहचानता है। उसने अपने अवैध कारोबार से बेंगलुरु, चैन्ने में कई घर, बंगले बनवाए। महंगी कारें खरीदीं। उसे साल 2003 में दहिसर पुलिस स्टेशन ने ठगी के केस में गिरफ्तार किया था। कई केसों में उसके खिलाफ मुकदमा चला। उसे 16 साल की सजा सुनाई गई। वह जेल भेजा गया, पर कुछ महीने बाद उसे सेशन कोर्ट से जमानत मिल गई।
मुंबई पुलिस के साइबर सेल द्वारा कई बार उसे गिरफ्तार किया गया, पर देश की किसी भी पुलिस ने साल 2003 के दहिसर पुलिस के केस को फॉलो ही नहीं किया। इस वजह से वह बेखौफ विदेश घूमता रहा और अपना ठगी का कारोबार बढ़ाता रहा।

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